अष्ट-संस्कारित पारद

भावप्रकाश में पारा चार प्रकार का लिखा गया है श्वेत, रक्त, पीत और कृष्ण । इसमें श्वेत श्रेष्ठ है । वैद्यक में पारा कृमिनाशक और कुष्ठनाशक, नेत्रहितकारी, रसायन, मधुर आदि छह रसों से युक्त, स्निग्ध, त्रिदोषनाशक, योग-वाही, शुक्रवर्धक और एक प्रकार से संपूर्ण रोगनाशक कहा गया है । पारे में मल, वह्नि, विष, नाम इत्यादि कई दोष मिले रहते हैं, इससे उसे शुद्ध करके प्रयोग में लाना चाहिए । पारा शोधने की अनेक विधियाँ वैद्यक के ग्रंथों में मिलती हैं ।

पारद से निर्मित सामग्री जैसे शिवलिंग / गुटिका / माला इत्यादि अष्ट संस्कारित पारद से निर्मित होने चाहिए . जैसा कि विभिन्न रस शास्त्र ग्रंथों में वर्णित है जैसे कि रसेंद्रसार, रस तरंगिणी, रस रत्न-समुच्चय, आदि। 

प्राकृतिक रूप से प्राप्त होने वाले पारद की शुद्धिकरण प्रक्रिया के विभिन्न चरणों को संस्कार कहा जाता है। संस्कार के बाद पारा विभिन्न दोषों से मुक्त हो जाता है और प्रकृति में दिव्य हो जाता है। सामान्य अवस्था में पारे में पाए जाने वाले 8 दोष होते हैं।

1- नाग दोष – लेड / सीसा की उपस्थिति। 

2- वंग दोष – टिन की उपस्थिति। 

3- मल दोष – अन्य धातु की उपस्तिथि जैसे आर्सेनिक, सोडियम आदि।

४- वाहि दोष – विषयुक्त पदार्थ जैसे संखिया, जस्ता आदि की उपस्थिति। 

५- चंचलता – पारद अपार चंचल होता है जो स्वयं में अशुद्धता है।

6- विष दोष – पारद में संयुक्त रूप में कई जहरीले तत्व होते हैं जो व्यक्ति को मृत कर सकते हैं।

7- गिरी दोष – पारद में अपने अस्तित्व और परिवेश के अनुसार कई अशुद्धियाँ होती हैं। 

8- अग्नि दोष – पारद 357 डिग्री सेल्सियस पर वाष्पित हो जाता है जो स्वयं एक अशुद्धता है। 

अतः संस्कारों को पारद को शुद्ध और फलदायी बनाने के लिए करना  आवश्यक होता है. 

इन 8 संस्कारों को पारा सभी दोषों से मुक्त होता है और अभ्रक, स्वर्ण माक्षिक और हर्बल अर्क के साथ संयुक्त किया जाता है। यह पूरी तरह से जस्ता, सीसा या टिन से मुक्त होता है। जिन्हें रसशास्त्र की पाठ्यपुस्तकों में पारद के दोषों के रूप में वर्णित किया गया है। इस पारद शिवलिंग को कपड़े या अपने हाथ पर रगड़ने से किसी भी प्रकार का कालापन नहीं दिखेगा। 

शोधन कर्म आठ प्रकार के कहे गए हैं रू स्वेदन, मर्दन, उत्थापन, पातन, बोधन, नियामन और दीपन । भावप्रकाश में मूर्छन भी कहा गया है जो कुछ ओषधियों के साथ मर्दन का ही परिणाम है ।

अगर पारद अष्ट-संस्कारित (सिद्ध) हो तो प्राप्त होने वाले लाभ की तुलना नहीं की जा सकती है। संस्कारित पारद दर्शन, धारण एवं पूजन के लिये महा कल्याणकारी माना गया है. इसी प्रकार संस्कारित पारद से बनी अन्य वस्तुएं जैसे की पारद शिवलिंग, पारद शंख, पारद श्रीयंत्र, इत्यादि के उपयोग से जीवन में इच्छित फलो की प्राप्ती संभव होती हैं।।रसचण्डाशुः नामक ग्रन्थ में कहा गया है-

शताश्वमेधेन कृतेन पुण्यं गोकोटिभि: स्वर्णसहस्रदानात।
नृणां भवेत् सूतकदर्शनेन यत्सर्वतीर्थेषु कृताभिषेकात्॥6॥

अर्थात सौ अश्वमेध यज्ञ करने के बाद, एक करोड़ गाय दान देने के बाद या स्वर्ण की एक हजार मुद्राएँ दान देने के पश्चात् तथा सभी तीर्थों के जल से अभिषेक (स्नान) करने के फलस्वरूप जो जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य केवल पारद के दर्शन मात्र से होता है।

स्कंद पुराण, रस रत्नाकर, निघंटु प्रकाश, शिवनिर्णय रत्नाकर आदि प्राचीन भारतीय ग्रंथ के अनुसार पारद निर्मित शिवलिंग, पारद शंख, पारद श्रीयंत्र, पारद गुटिका, पारद पेंडेंट, पारद पिरामिड, पारद लक्ष्मी गणेश, पारद पात्र,पारद मुद्रिक इत्यादि के उपयोग से चमत्कारिक लाभ प्राप्त होते हैं।

ग्रंथो के ही अनुसार पारद के प्रयोग करने से पहले उसका संस्कारित (सुधिकरण एवं ऊर्जावान ) होना भी अतयंत आवश्यक है। अगर पारद अष्ट-संस्कारित (सिद्ध) हो तो प्राप्त होने वाले लाभ की तुलना नहीं की जा सकती है। संस्कारित पारद दर्शन, धारण एवं पूजन के लिये महा कल्याणकारी माना गया है. इसी प्रकार संस्कारित पारद से बनी अन्य वस्तुएं जैसे की पारद शिवलिंग, पारद शंख, पारद श्रीयंत्र, इत्यादि के उपयोग से जीवन में इच्छित फलो की प्राप्ती संभव होती हैं।इससे घर में शांति होती है।

 

सौजन्य से (Ayurved Darpan – Journal of Indian Medicin ) : रसशास्त्र एवं पारद संस्कार क्या है ?