Frequently Asked Question's

पारद श्वेत रंग की चमकदार द्रव धातु है. द्रव रूप और चाँदी के समान चमकदार होने के कारण पुरातन युग से पारद कौतूहल का विषय रहा है। लगभग १,५०० ईसवी पूर्व में बने मिस्र के मकबरों में पारद प्राप्त हुआ है। भारत में इस तत्व का प्राचीन काल से वर्णन हुआ है। चरक संहिता में दो स्थानों पर इसे ‘रस’ और ‘रसोत्तम’ नाम से संबोधित किया गया है। वाग्भट ने औषध बनाने में पारद का वर्णन किया है। वृन्द ने सिद्धयोग में कीटमारक औषधियों में पारद का उपयोग बताया है। तांत्रिक काल (७०० ई. से लेकर १३०० ई.) में पारद का बहुत उल्लेख मिलता है। इस काल में पारद को बहुत महत्ता दी गई। पारद की ओषधियाँ शरीर की व्याधियाँ दूर करने के लिये संस्तुत की गई हैं। तांत्रिक काल के ग्रंथों में पारद के लिये ‘रस’ शब्द का उपयोग हुआ है। इस काल की पुस्तकों के अनुसार पारद से न केवल अन्य धातुओं के गुण सुधर सकते हैं वरन् उसमें मनुष्य के शरीर को अजर बनाने की शक्ति है। नागार्जुन द्वारा लिखित रसरत्नसमुच्चय नामक ग्रंथ में पारद की अन्य धातुओं से शुद्ध करने तथा उससे बनी अनेक ओषधियों का विस्तृत वर्णन मिलता है। तत्पश्चात् अन्य ग्रंथों में पारद की भस्मों तथा अन्य यौगिकों का प्रचुर वर्णन रहा है।

पारे का वर्णन चीन के प्राचीन ग्रंथों में भी हुआ है। यूनान के दार्शनिक थिओफ्रेस्टस ने ईसा से ३०० वर्ष पूर्व ‘द्रव चाँदी’ (quicksilver) का उल्लेख किया था, जिसे सिनेबार (HgS) को सिरके से मिलाने से प्राप्त किया गया था। बुध (Mercury) ग्रह के आधार पर इस तत्व का नाम ‘मरकरी’ रखा गया। इसका रासायनिक संकेत (Hg) लैटिन शब्द हाइड्रारजिरम (hydrargyrum) पर आधारित है।

पुराणों और वैद्यक की पोथियों में पारे की उत्पत्ति शिव के वीर्य से कही गई है और उसका बड़ा माहात्म्य बताया गया है, यहाँ तक कि यह ब्रह्म या शिवस्वरूप कहा गया है । पारे को लेकर एक रसेश्वर दर्शन ही खड़ा किया गया है जिसमें पारे ही से सृष्टि की उत्पत्ति कही गई है और पिंडस्थैर्य (शरीर को स्थिर रखना) तथा उसके द्वारा मुक्ति की प्राप्ति के लिये रससाधन ही उपाय बताया गया है

रसचण्डाशुः नामक ग्रन्थ में कहा गया है-

शताश्वमेधेन कृतेन पुण्यं गोकोटिभि: स्वर्णसहस्रदानात।
नृणां भवेत् सूतकदर्शनेन यत्सर्वतीर्थेषु कृताभिषेकात्॥6॥

अर्थात सौ अश्वमेध यज्ञ करने के बाद, एक करोड़ गाय दान देने के बाद या स्वर्ण की एक हजार मुद्राएँ दान देने के पश्चात् तथा सभी तीर्थों के जल से अभिषेक (स्नान) करने के फलस्वरूप जो जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य केवल पारद के दर्शन मात्र से होता है।

स्कंद पुराण, रस रत्नाकर, निघंटु प्रकाश, शिवनिर्णय रत्नाकर आदि प्राचीन भारतीय ग्रंथ के अनुसार पारद निर्मित शिवलिंग, पारद शंख, पारद श्रीयंत्र, पारद गुटिका, पारद पेंडेंट, पारद पिरामिड, पारद लक्ष्मी गणेश, पारद पात्र,पारद मुद्रिक इत्यादि के उपयोग से चमत्कारिक लाभ प्राप्त होते हैं।

ग्रंथो के ही अनुसार पारद के प्रयोग करने से पहले उसका संस्कारित (सुधिकरण एवं ऊर्जावान ) होना भी अत्यंत आवश्यक है। अगर पारद अष्ट-संस्कारित (सिद्ध) हो तो प्राप्त होने वाले लाभ की तुलना नहीं की जा सकती है। संस्कारित पारद दर्शन, धारण एवं पूजन के लिये महा कल्याणकारी माना गया है. इसी प्रकार संस्कारित पारद से बनी अन्य वस्तुएं जैसे की पारद शिवलिंग, पारद शंख, पारद श्रीयंत्र, इत्यादि के उपयोग से जीवन में इच्छित फलो की प्राप्ती संभव होती हैं।

आज के व्यस्त युग में जहां मनुष्य के लिये जटिल और विधिसम्मत पूजापाठ करना और करवाना मुश्किल सा हो गया है. ऐसे में संस्कारित पारद का दर्शन, धारण एवं अन्य उपयोग सुखी और समृद्ध जीवन के लिये अमोघ उपाय है।

किन्तु पारद के वास्तविक संस्कारित होने और जातक के जन्म नक्षत्र अथवा गोचर के अनुरूप उसका विशेष मन्त्रों के जाप के साथ अभिमंत्रित होने से ही जातक को उसके वास्तविक पुण्यों की प्राप्ति होती है.

इस हेतु Dhumra Gems द्वारा पारद शिवलिंग, यंत्रों, गुटिका और माला आदि का निर्माण का अंतिम चरण तभी पूर्ण किया जाता है जब इच्छुक जातक द्वारा अपना जन्म विवरण आदि भेजकर उसके पूर्ण अभिमंत्रित करने का निवेदन किया जाता है. इस कारण हमारे प्रयोगशाला से यज्ञशाला और वहां से जातक तक पहुँचने में लगभग 2 – 3 सप्ताह का समय अतरिक्त लग जाता है.

भावप्रकाश में पारा चार प्रकार का लिखा गया है— श्वेत, रक्त, पीत और कृष्ण । इसमें श्वेत श्रेष्ठ है । वैद्यक में पारा कृमिनाशक और कुष्ठनाशक, नेत्रहितकारी, रसायन, मधुर आदि छह रसों से युक्त, स्निग्ध, त्रिदोषनाशक, योग-वाही, शुक्रवर्धक और एक प्रकार से संपूर्ण रोगनाशक कहा गया है । पारे में मल, वह्नि, विष, नाम इत्यादि कई दोष मिले रहते हैं, इससे उसे शुद्ध करके प्रयोग में लाना चाहिए । पारा शोधने की अनेक विधियाँ वैद्यक के ग्रंथों में मिलती हैं । शोधन कर्म आठ प्रकार के कहे गए हैं— स्वेदन, मर्दन, उत्थापन, पातन, बोधन, नियामन और दीपन । भावप्रकाश में मूर्छन भी कहा गया है जो कुछ ओषधियों के साथ मर्दन का ही परिणाम है ।

अगर पारद अष्ट-संस्कारित (सिद्ध) हो तो प्राप्त होने वाले लाभ की तुलना नहीं की जा सकती है। संस्कारित पारद दर्शन, धारण एवं पूजन के लिये महा कल्याणकारी माना गया है. इसी प्रकार संस्कारित पारद से बनी अन्य वस्तुएं जैसे की पारद शिवलिंग, पारद शंख, पारद श्रीयंत्र, इत्यादि के उपयोग से जीवन में इच्छित फलो की प्राप्ती संभव होती हैं।।रसचण्डाशुः नामक ग्रन्थ में कहा गया है-

शताश्वमेधेन कृतेन पुण्यं गोकोटिभि: स्वर्णसहस्रदानात।
नृणां भवेत् सूतकदर्शनेन यत्सर्वतीर्थेषु कृताभिषेकात्॥6॥

अर्थात सौ अश्वमेध यज्ञ करने के बाद, एक करोड़ गाय दान देने के बाद या स्वर्ण की एक हजार मुद्राएँ दान देने के पश्चात् तथा सभी तीर्थों के जल से अभिषेक (स्नान) करने के फलस्वरूप जो जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य केवल पारद के दर्शन मात्र से होता है।

स्कंद पुराण, रस रत्नाकर, निघंटु प्रकाश, शिवनिर्णय रत्नाकर आदि प्राचीन भारतीय ग्रंथ के अनुसार पारद निर्मित शिवलिंग, पारद शंख, पारद श्रीयंत्र, पारद गुटिका, पारद पेंडेंट, पारद पिरामिड, पारद लक्ष्मी गणेश, पारद पात्र,पारद मुद्रिक इत्यादि के उपयोग से चमत्कारिक लाभ प्राप्त होते हैं।

ग्रंथो के ही अनुसार पारद के प्रयोग करने से पहले उसका संस्कारित (सुधिकरण एवं ऊर्जावान ) होना भी अतयंत आवश्यक है। अगर पारद अष्ट-संस्कारित (सिद्ध) हो तो प्राप्त होने वाले लाभ की तुलना नहीं की जा सकती है। संस्कारित पारद दर्शन, धारण एवं पूजन के लिये महा कल्याणकारी माना गया है. इसी प्रकार संस्कारित पारद से बनी अन्य वस्तुएं जैसे की पारद शिवलिंग, पारद शंख, पारद श्रीयंत्र, इत्यादि के उपयोग से जीवन में इच्छित फलो की प्राप्ती संभव होती हैं।

सामान्य अवस्था में पाया जाने वाले पारा को यदि गर्म किया जाये तो 356.7 डिग्री सेंटीग्रेट पर वह उबल कर वाष्पीकृत होने लगता है. किन्तु पूर्ण शास्त्रीय विधि से अष्ट संस्कारित ठोस पारद का क्वथनांक लगभग 980 डिग्री सेंटीग्रेट हो जाता है. अर्थात चांदी के गलनांक से भी ज्यादा. इस प्रकार के पारद को अग्निस्थायी पारद कहा जाता है. इसकी रस शास्त्रों, तंत्र ग्रंथों और आयुर्वेद में अपरम्पार महिमा बताई गयी है

पारद (रस) के कुल 18 संस्कार संपन्न किये जाते हैं जिनमे पहले आठ संस्कार रोग मुक्ति हेतु, औषधि निर्माण, रसायन और धातुवाद के लिए आवश्यक हैं जबकि शेष 10 संस्कार खेचरी सिद्धि , धातु परिवर्तन, सिद्ध सूत और स्वर्ण बनाने में प्रयुक्त होते हैं।

आचार्यो ने जो 18 संस्कार बताए हैं वे निम्नलिखित हैं –

1) स्वेदन2) मर्दन3) मूर्च्छन4) उत्थापन5) त्रिविधपातन6) रोधन7) नियामन8) संदीपन9) गगनभक्षण
10) संचारण11) गर्भदुती12) बार्ह्यादुती13) जारण14) रंजन15) सारण16) संक्रामण17) वेधन18) शरीरयोग
1- स्वेदन :
दोलायंत्र में विभिन्न प्रकार के क्षारीय या अम्लीय द्रवों को औषधियों को भरकर उसमे पारद को पोटली में बंदकर युक्तिपूर्वक पकाने को स्वेदन कहा जाता है. इसमें पिप्प्ली, मरीच , चित्रक , अदरख, सोंठ, सैंधा नमक, त्रिफला, कांजी आदि औषधियों का प्रयोग किया जाता है. इसमें तीन दिन का समय लगता है.
 
2- मर्दन :
क्षार आदि औषधि द्रव्यों के साथ पारद को खरल में डाल कर पिसने को मर्दन कहा जाता है. ईंट का चूर्ण, सैन्धानमक, हल्दी, घर का धुंवा, गुड राइ सोंठ आदि औषधियों के प्रयोग के साथ इस संस्कार में तीन दिन लगते हैं.
 

3- मूर्च्छन :

पारद के मल, बह्रि तथा विष दोषों को दूर करने के लिए घिक्वार आदि द्रवों के साथ पारद का मर्दन करते हुए नष्टपिष्ट करना मूर्च्छन संस्कार कहलाता है. जावाख्वार, सज्जीखार, पांचों नमक तथा अम्ल द्रव के प्रयोग से इस संस्कार में तीन दिन लगते है.
 

4- उत्थापन :

पारद को जम्बिरी निम्बू अथवा बिजोरा निम्बू आदि अम्ल्द्रवों के साथ तीन पहर तक धुप में मर्दन करके कपडे से छान लेने पर इसकी मूर्च्छा दूर होकर उत्थापन हो जाता है. जम्बिरी निम्बू, बिजोरा निम्बू आदि अम्लद्रवों के साथ होने वाले इस संस्कार में तीन प्रहर का समय लगता है.
 

5- त्रिविधपातन:

पातन करने के निमित्त कही गयी औषधियों के साथ पारद को मर्दन कर यन्त्र में रख कर उर्ध्व, अध: व् तिर्यक रूप से पातन कर लेने को त्रिविधपातन कहा जाता है. हरीतकी, विभीतक, राई , सैंधा नमक, चित्रक, सहेजने के बीज, अम्ल्द्रव के साथ होने वाले इस संस्कार में तीन प्रहर का समय लगता है.
 

6- रोधन :

मर्दन, पातन आदि संस्कारों के द्वारा पारद में एक प्रकार की नपुंसकता आ जाती है. इस नपुंसकता को दूर करने हेतु किये जाने वाले संस्कार को बोधन या रोधन कहते हैं. पारद को भोजपत्र में रख कपडे की पोटली में बांध कर सैंधा नमक और जल के साथ मंद आंच में पकाने पर रोधन संस्कार होता है.
 

7- नियामन :

बोधन संस्कार द्वारा लब्धवीर्य पारद के चापल्य दोष को दूर करने हेतु पारद का नियामन संस्कार किया जाता है. इसमें भृंगराज, नागरमोथा, बाँझ ककोडा और अन्य जड़ी बूटियों के रस के साथ दोलायंत्र में ये संस्कार पूर्ण किया जाता है.
 

8- संदीपन या दीपन संस्कार : 

दोलायंत्र में क्षार आदि औषधि द्रवों को भरकर उसमे पारद को इतना स्वेदन किया जाये की वह धातुओं का ग्रास कर सके, इस क्रिया को संदीपन या दीपन कहते हैं. चित्रक क्वाथ तथा कांजी में तीन दिन तक पारद का स्वेदन किया जाये तो उसमे धातु ग्रास करने की शक्ति उत्पन्न हो जाती है. इस क्रिया में दो दिन का समय लगता है.