रत्न गुटिका


इस गुटिका का निर्माण रत्न के सत्व को अष्ट संस्कारित पारद के साथ विशेष मुहूर्त में सायुज्जीकरण करके किया जाता है. धारण से पूर्व इसका जातक के लिए प्राण-प्रतिष्ठा और अभिमन्त्रण किया जाता है. इसके धारण करने से जातक को रत्न के सम्पूर्ण सकारात्मक प्रभाव का लाभ मिलता है.
    आमतौर पर बाज़ार में शुद्ध प्रकृतिक रत्न मिलना दुर्लभ होता है.क्यूंकि रत्न की प्राप्ति के समय उसकी संरचना में विभिन्न प्रकार के दोष मिलते हैं. इस कारण रत्न की आकृति देने के लिए जब मशीनों से पॉलिश की जाती है तो मात्र थोड़े से हिस्से से ही पूर्ण शुद्ध और निर्दोष रत्न निकलता है . बाकि अधिकांश हिस्से में गड्ढे, टूट-फुट, अशुभ चिन्ह, धब्बे आदि होते हैं. परन्तु व्यवसायिक लाभ कमाने हेतु ऐसे दोषों को विभिन्न प्रकार के बनावटी तरीकों से छिपा कर बाज़ार में बेच दिया जाता है.
यही कारण है की बाज़ार में ग्राहक को एक ही वजन का रत्न विभिन्न कीमतों में मिल जाता है. विक्रेता कभी उसकी गुणवत्ता में अंतर को उजागर नही करता.
और इस प्रकार ग्राहक को ठग लिया जाता है. कालांतर में ऐसा दोषपूर्ण रत्न को धारण करने के बाद भी अपेक्षित लाभ नही मिलता, अपितु अनेक बार नुकसान भी होने लगता है. इस  पर ग्राहक का विश्वास ज्योतिष से उठने लगता है.
बाज़ार की इस धोखाधड़ी से बचने हेतु ही पुरातन काल से विभिन्न रसशास्त्रों में पारद में प्राकृतिक रत्न के सत्व के साय्युजिकरण द्वारा रत्न गुटिका बनाने का उल्लेख किया गया.
अष्ट संस्कारित पारद के साथ मिलकर रत्न सत्व जातक को साधारण  रत्न की अपेक्षा सैकड़ों गुना लाभ देता है. 

 

 

 

 

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